बलराज साहनी

Balraj_Sahni_Poster-JNU-Speech-Bollywoodirect-Interview-films-movies-songs-wife-son“इंसान कब तक अकेला जी सकता है?”

ये आखिरी लाइन थी जिसे बलराज साहनी ने रिकार्ड किया था। फ़िल्म थी ‘गरम हवा’ जो 1973 में आई थी। ये फ़िल्म बलराज साहनी की अंतिम फ़िल्म बनी। इस फ़िल्म की डबिंग करने के कुछ दिन बाद ही उनका इंतकाल हो गया।

ये सवाल हमेशा मेरे ज़हन में दौड़ता है की आज हम बलराज साहनी को किस रूप में देखते है? वह देव आनंद नहीं थे। न ही वह दिलीप कुमार थे। बलराज साहनी का नाम सुनते ही आपके दिमाग में किसी प्यार के नग्में या रोमांटिक गीत की लहर नहीं चलती। बल्कि, दौड़ने लगता है वह दृश्य आंखो के सामने जिसमे एक किसान जो अपनी ज़मीन बचाने के लिए गाँव छोड़ शहर आया है और रिक्शा खिंच कर पैसा इकट्ठा कर रहा है। और याद आता है वह काबुलीवाला जो लोगो को सामान उधार पर दे देता है इस उम्मीद में की लोग उसके पैसे एक दिन लौटा देंगे। वही काबुलीवाला जिसे लगता है की ये दुनिया उतनी बेरहम नहीं जितना की लोग कहते है।

बलराज साहनी उन अभिनेताओ में से थे जोBalraj_Sahani_with_his_wife_Damayanti,_1936_Bollywoodirect-बलराज साहनी-interview-films-movies-son-jnu speech- पढ़े-लिखे थे। उन्होने अंग्रेजी साहित्य में बैचलर्स की पढाई की थी और मास्टर्स हिंदी साहित्य में किया था। इप्टा को बनाने और सवारने में भी उनका बहुत बड़ा योगदान है। साहनी एक गंभीर किस्म के व्यक्ति थे। उनके लिए चकाचौंद व्यक्तितव और स्टारडम से ज़्यादा मायने रखता था एक अच्छा कलाकार और इंसान होना। दरअसल, यही एक कारण था की वे हमारी नज़रो में कभी ‘हीरो’ नहीं बन पाये। क्योंकि वे बनना नहीं चाहते थे।

उनकी ज़िन्दगी में दुःख और संघर्ष की अंगड़ाइयां इतनी रही की उन्हें कभी आराम से सोने नहीं दिया। 1946 में आई ‘धरती के लाल’ से उन्होंने सिनेमा की दुनिया में कदम रखा जिसमे उनके साथ उनकी पत्नी दमयंती ने भी काम किया था। इस से ज़्यादा ख़ुशी की बात क्या हो सकती थी। मगर ख़ुशी ज़्यादा दिन अपने आपको बरक़रार न रख सकी। दमयंती अगले ही वर्ष चल बसी। यूँ अपनों का छोड़ जाना उनके ज़िन्दगी में अंत तक चला।

बलराज साहनी का वामपंथ की और झुकाव भी उन्हें कई बार परेशानियो में डाल चुका था। सन् 1951 में जब वह ‘हलचल’ की शूटिंग में व्यस्त थे, उन्हें पुलिस ने गिरफ्तार कर लिया था। वजह थी उनका वामपंथ। के आसिफ के कोर्ट के चक्कर लगाने के बाद ही साहनी को फ़िल्म शूट करने की इजाज़त मिल पायी।

अगर आप बलराज साहनी के जीवन के भीतर ताकेंगे तो पाएंगे की वह अपने फ़िल्मी करियर में किये हुए कुछ महान किरदारों के काफी निकट थे। चाहे वो ‘दो बीघा ज़मीन’ का शम्भू हो, ‘काबुलीवाला’ का रहमत खाँ या फिर ‘गरम हवा’ का सलीम मिर्ज़ा। इन सभी किरदारों में जो एक समानताये थी वह था दुःख और संघर्ष। बलराज साहनी का जीवन भी इन्ही सब के बिच गुज़रा।

ये तीन फिल्में ही वे फिल्में है जिनके लिए उन्हें सबसे ज़्यादा याद किया जाता है आज। बिमल दा की ‘दो बीघा ज़मीन’ ने ही बलराज साहनी को हिंदी सिनेमा के बेहतरीन कलाकारों की सूची में नाम दर्ज करवाया। आज भी आप इस फ़िल्म को देखिये। भूल जाएंगे की जो आदमी रिक्शा खीच रहा है वह बलराज साहनी है। वह कोई अभिनेता है। मगर क्या बलराज साहनी के लिए उस किरदार को निभा पाना इतना आसान था की वह सचमुच एक किसान लगने लगे। शायद नहीं। उस किरदार को अपने अंदर उतारने के लिए साहनी ने एक गमछा सर पे बांधे लगातार दो हफ़्तों तक सड़को पे रिक्शा खीचा था।

आज शायद ही कोई तथाकथित ‘हीरो’ इतनी मेहनत करने की सोचता होगा। बहुत साल बाद फ़िल्म ‘सिटी ऑफ़ जॉय’ के लिए ओम पूरी ने प्रेरणा लेते हुए कुछ ऐसा ही किया था। फ़िल्म काबुलीवाला में अपने किरदार को समझने के लिए वह बहुत दिन कबुलीवालो के बिच में रह के आये थे। उनका अपने काम के प्रति लगाव उनके फिल्मो को मजबूत बनाता है।

बलराज साहनी सिर्फ एक सफल अभिनेता नहीं थे। अगर हम यहाँ यह बात ना करे की वह कितने अच्छे लेखक थे तो यह उनके साथ नाइंसाफी होगी। यही वजह है की वह जहाँ भी जाते थे साथ में अपना टाइप-राइटर साथ लिए जाते थे। जब भी समय मिलता वह लिखना शुरू कर देते। मुझे नहीं मालूम की आप में से कितने लोगो को यह पता है की गुरु दत्त की फ़िल्म ‘बाज़ी’ की कहानी और संवाद उन्ही के थे। अपने भाई भीष्म साहनी की हिंदी पत्रिका ‘नई कहानी’ में भी वे लंबे समय तक लिखते रहे।

बलराज साहनी जब तक सांस लेते रहे, काम करते रहे। यह एक अच्छा संयोग था की उनकी अंतिम फ़िल्म ‘गरम हवा’ बनी। सलीम मिर्ज़ा उनका निभाया हुआ अंतिम किरदार। ये इसलिए क्योंकि ये किरदार उनके सबसे ज़्यादा करीब जान पड़ता है। बंटवारे का दर्द, संघर्ष में गुज़रा जीवन, और हर कदम पर एक लड़ाई।

वे जब तक रहे, लड़ते रहे। मगर कई हादसे ऐसे होते है जो आपको कमज़ोर बना देते है। इतना कमज़ोर की हर लड़ाई भारी पड़ने लगती है। उनके जीवन में भी एक ऐसा हादसा आया जो उन्हें कमज़ोर बना गया। ये वह दिन था जब उनकी जवान बेटी शबनम उन्हें छोड़ गयी। अपनो का छोड़ जाना उनके ज़िन्दगी में ख़त्म नहीं हो रहा था। बेटी के चले जाने के बाद बलराज टूट से गए थे। यही वजह थी की सन् 1960 के अप्रैल माह में दिल का दौर पड़ने से उनका देहांत हो गया।

यदि वह कुछ वर्ष और जीते तो शायद कई और ऐसे किरदार निभाते जो आज भी अमर रहते। ये कहते हुए फिर याद आती है वह अंतिम लाइन जो उन्होंने रिकॉर्ड की थी।

“इंसान कब तक अकेला जी सकता है”

Written By: Shubham Pandey

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