गीत – किसी पत्थर की मूरत से मोहब्बत का इरादा है
फ़िल्म – हमराज़ (1967)
संगीतकार – रवि
गीतकार – साहिर लुधियानवी
गायक – महेन्द्र कपूर

साहिर लुधियानवी और संगीतकार रवि को सबसे पहली बार बी आर चोपड़ागुमराह‘(1963) में एक साथ ले कर आये थे। ‘गुमराह’ का गीत संगीत अत्यन्त लोकप्रिय हुआ था। साहिर लुधियानवी इसके पहले से ही बी आर चोपड़ा की फ़िल्मों में गीत लिखते आ रहे थे। ‘नया दौर‘ (1957) के गीतों की सफलता का श्रेय लेने की ओ पी नय्यर और साहिर में होड़ लगी थी। दोनों की अहम् की लड़ाई के कारण बी आर चोपड़ा ने ‘साधना‘ (1958) में ओ पी नय्यर के स्थान पर एन दत्ता को संगीतकार के रूप में साहिर के साथ लिया था। ‘प्यासा‘ (1957) के बाद ‘काग़ज़ के फूल‘ (1959) में गुरुदत्त ने एस डी बर्मन के साथ साहिर की अनबन के कारण क़ैफ़ी आज़मी से गीत लिखवाये थे। ध्यान रहे कि ‘प्यासा’ के मुक़ाबले ‘काग़ज़ के फूल’ का संगीत कम लोकप्रिय हुआ था। बचपन में पिता के तानाशाही और दबंग रवैय्ये तथा फ़िल्मी दुनिया में शुरू शुरू में मिली उपेक्षा के कारण साहिर के स्वभाव में एक कड़वाहट सी आ गयी थी।

उनकी फ़िल्मों में गीत लिखने की एक और शर्त रहने लगी थी। उन्हें फ़िल्म के संगीतकार के बराबर पारश्रमिक मिलना चाहिये। इस कारण प्रोड्यूसर उन्हें हिट और शीर्ष मंहगे संगीतकारों के साथ साइन करने में हिचकते थे। नौशाद और शंकर जयकिशन के साथ उनकी कोई फ़िल्म नहीं है। शंकर जयकिशन भी उन दिनों शैलेन्द्र और हसरत जयपुरी के अलावा अन्य गीतकारों के साथ काम करने तैयार नहीं होते थे। सचिन देव बर्मन, ओ पी नय्यर, जयदेव आदि संगीतकारों के साथ साहिर ने ‘ईगो’ के कारण काम करना बंद कर दिया था। लेकिन रवि के विनम्र स्वभाव के कारण ‘गुमराह’ से जो उनका साथ शुरू हुआ वह लम्बा चला। साहिर लुधियानवी ने सबसे ज़्यादा लगभग उन्नीस फ़िल्में उनके साथ कीं। संख्या में उसके बाद एस डी बर्मन और एन दत्ता के साथ की गयीं फ़िल्मों के नम्बर आते हैं।

‘गुमराह’ के बाद बी आर चोपड़ा की अगली कई फ़िल्मों में रवि का संगीत रहा – हमराज़, वक़्त, आदमी और इंसान, धुँध, दहलीज़, निकाह, आज की आवाज़, अवाम आदि। बी आर फ़िल्म्स की फ़िल्मों में मोहम्मद रफ़ी और लता मंगेशकर के गीत कम होते थे। इसका कारण कभी स्पष्ट नहीं हुआ। अपने समय के दो शीर्ष गायकों के बिना भी उनकी फ़िल्मों का संगीत हिट रहता था और फ़िल्में भी बाक्स आॅफिस पर सफल रहती थीं। महेन्द्र कपूर और आशा भोंसले उनके प्रिय गायक कलाकार थे। महेन्द्र कपूर को ‘चलो इक बार फिर से अजनबी बन जायें हम दोनों (गुमराह) और ‘नीले गगन के तले धरती का प्यार पले’ (हमराज़) गीतों के लिये फ़िल्मफ़ेयर के सर्वश्रेष्ठ गायक के अवार्ड भी मिले थे।

फ़िल्म ‘हमराज़’ (1967) के समय रवि के ज़रिये ही बी आर चोपड़ा की भेंट विमी से हुई। वे ‘हमराज़’ के लिये नायिका की तलाश में थे। विमी विवाहिता तथा दो बच्चों की माँ थीं पर उनका निर्दोष सौन्दर्य किसी को भी प्रभावित करने में सक्षम था। वे कलकत्ता के धनाड्य व्यापारी अग्रवाल परिवार की बहू थीं। लेकिन परिवार की मर्ज़ी के ख़िलाफ़ वे फ़िल्म में काम करने की इच्छुक थीं। चोपड़ा साहब ने उन्हें ‘हमराज़’ के लिये साइन कर लिया।

विमी अनिंद्य सौन्दर्य की स्वामिनी थीं और फोटोजेनिक भी ग़ज़ब की थीं। पर्दे पर वे अत्यन्त आकर्षक नज़र आती थीं। लेकिन अभिनय प्रतिभा उनमें कम ही थी। उनकी सारी रुचि अच्छे कपड़ों और शानदार मेकअप तक सीमित थी। चेहरा सदैव भावशून्य रहता था तथा सामान्य से सामान्य शाट भी मुश्किल से ओके हो पाता था। शायद उनके मूर्तीवत् भावविहीन चेहरे के कारण ही साहिर लुधियानवी ने फ़िल्म ‘हमराज़’ का गीत लिखा था –

किसी पत्थर की मूरत से मोहब्बत का इरादा है,
परस्तिश की तमन्ना है इबादत का इरादा है.

साभार:- श्री रवींद्रनाथ श्रीवास्तव जी।

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