“उस ग़ैरत-ए-नाहीद की हर तान है दीपक
शोला सा लपक जाए है, आवाज़ तो देखो|”

मोमिन का ये शेर, जज़्बात बयां करता है, उन मुरीदों का जो किसी आवाज़ में, कभी अपने रंज और ग़म डुबो कर सुकून पाते हैं तो कभी ज़िंदगी के हासिल से परे ख़्वाबों के जज़ीरे तक जाते हैं| हर बार ज़रिया, वो कशिश और ख़ुसूसियत से भरी आवाज़ ही होती है|

सिनेमा के गीत हमारी ज़िंदगी का अहम हिस्सा रहे हैं और इन गीतों को गाने वाले फ़नकारों की आवाज़, हमेशा किसी अपने की ही आवाज़ लगी है| मो०रफ़ी, किशोर कुमार, मुकेश, लता मंगेशकर, महेन्द्र कपूर, जगजीत सिंह और कई ऐसे नाम हैं जिन्होंने कई दफ़ा हमारे अहसासों को आवाज़ दी है| ऐसी ही एक आवाज़ जो शोले की तरह लपक कर दिल पर चस्पा होती थी, वो, जसपाल सिंह जी की आवाज़ थी|

अमृतसर के एक बड़े परिवार में पैदा हुए जसपाल सिंह जी को शुरू से ही मौसिक़ी में दिलचस्पी थी, लेकिन पेशे के तौर पर ये वकालत अपनाएं, ऐसा घरवाले चाहते थे| लेकिन इन्हें तो बंबई (अब मुंबई) जाना था,जहां इनकी बहन रहती थीं और जहां ये एक पेशेवर गुलूकार या गायक बन सकते थे| चाहत और शिद्दत ने मिलकर वहाँ पहुंचा भी दिया और बाक़ी का रास्ता, इनके बहनोई, जसवीर सिंह खुराना ने तय करवा दिया, जब उन्होंने, जसपाल सिंह जी को संगीतकार, उषा खन्ना जी से मिलवा दिया| उषा खन्ना जी ने उन्हें 1968 में आई फ़िल्म “बंदिश” में मौक़ा दिया, लेकिन उनके गाए गीत चल न सके, वापस अमृतसर आना पड़ा| लेकिन कुछ ही दिनों बाद #जसपाल जी फिर मायानगरी पहुंचे और एक बार फिर, उषा खन्ना जी ने ही उन्हें फ़िल्म, “अनजान है कोई” में गाने का मौक़ा दिया, नतीजा भी फिर वही हुआ, गाना बहुत नहीं चला| एक चीज़ अच्छी हुई कि इस फ़िल्म में इन्हें महेन्द्र कपूर जी के साथ गाने का मौक़ा मिला| लेकिन बहुत सी अच्छी चीज़ें होनी बाक़ी थीं|

1970 से 1979 के बीच, इन्होंने “गीत गाता चल”, “अंखियों के झरोखों से” और “सावन को आने दो” जैसी फ़िल्मों के तक़रीबन सारे मशहूर गाने गाए, जिनमें रवीन्द्र जैन और राजकमल जी जैसे संगीतकारों का संगीत था| इन्होंने जो रामायण की चौपाईयां और कबीर, रहीम के दोहे गाए, वो आज भी कई घरों में सुने जा सकते हैं| अभी पिछले ही साल, दिल्ली में एक जलसे में एक गायक ने जैसे ही गाया, ” तुझे गीतों में ढालूंगा” हज़ारों की भीड़( जिसमें युवा ही ज़्यादा थे) ने अगली लाइन एक साथ गाई और पूरा माहौल, “सावन को आने दो” से गूंज उठा| ये साबित करता है कि वक़्त से लड़कर भी ज़िंदा रही है ये आवाज़| इसके बाद के सालों में जो हुआ, वो असल जादू था| 1982 में राजश्री प्रोडक्शन्स की, “नदिया के पार” आई और चंदन (सचिन पिलगांवकर) और गुंजा (साधना सिंह) के ऊपर जो गीत फ़िल्माया गया,वो आज भी रूमानियत और सादगी की एक मिसाल है| गाना था, “कौन दिसा में ले के”| इसी फ़िल्म के गीत, “सांची कहें, तोरे आवन से हमरे” और “जोगी जी धीरे धीरे” ने जसपाल साहब को हर घर तक पहुंचा दिया|

सब कुछ एक ख़ूबरू ख़्वाब के जैसा चल रहा था और इस क़दर मशहूर होने के बाद, उम्मीदें भी बहुत थीं, लेकिन एक शानदार गायक की सारी ख़ूबियों से भरी इस आवाज़ को सचिन पिलगांवकर की आवाज़ मान लिया गया और काम मिलना कम होता चला गया,क्योंकि, इत्तेफ़ाकन इनके सारे मशहूर गीतों के नायक/ अदाकार/हीरो, सचिन ही थे| एक और वजह थी, उर्दू शायरी को सिनेमा में तरजीह मिलना| जसपाल जी के ज़्यादातर गीतों के बोल शुद्ध हिन्दी, गंवई या अवधी, ब्रज में थे|

सारी चमक होने के बाद भी, ये रौशन चिराग़ उन रोशनियों की फ़ेहरिस्त में शामिल न हो सका जो क़िस्मत के क़िले से अंधेरे भगाते हैं|

जसपाल साहब, अब भी कभी कभी किसी जलसे में अपने गीतों के साथ नज़र आते हैं, उसी बुलबुल (अंदलीब) की तरह, जिसके लिए ग़ालिब ने कहा था,

“मैं अंदलीब-ए-गुलशन-ए- ना आफ़रीदा हूँ”
(मैं वो बुलबुल हूँ, जिसका बाग़ीचा अभी बना ही नहीं)

© विमलेन्दु

लेखक जाने-माने साहित्यकार, स्तंभकार, व शिक्षाविद हैं.

फ़ोटो : साभार Google

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