गीत- जाने कैसे सपनों में खो गयीं अँखियाँ
फ़िल्म – अनुराधा (1960)
संगीतकार – पंडित रवि शंकर
गीतकार – शैलेन्द्र
गायिका – लता मंगेशकर

लीला नायडू 1954 में ‘मिस इण्डिया’ प्रतियोगिता की विजेता रहीं थीं। उनकी सुन्दरता के चर्चे चहुँओर थे। ‘वोग’ पत्रिका ने विश्व की दस सुन्दरतम महिलाओं की सूची में उनका नाम शामिल किया था। उनके साथ भारत से जयपुर की महारानी गायत्री देवी जी का भी नाम उस सूची में मौजूद था। लीला नायडू की सुन्दरता से प्रभावित हो कर फ़िल्मों में काम करने के लिये उन्हें बहुत से प्रस्ताव मिल रहे थे । राज कपूर का प्रस्ताव भी उनमें से एक था। ‘अनाड़ी‘ की सफलता के बाद हृषिकेश मुखर्जी अपनी नई फ़िल्म ‘अनुराधा‘ बनाने की तैयारी कर रहे थे । उन्होंने भी लीला नायडू को अपनी फ़िल्म में हीरोइन बनने का प्रस्ताव दिया । राज कपूर का प्रस्ताव अस्वीकार कर लीला नायडू ने हृषिकेश मुखर्जी की फ़िल्म ‘अनुराधा’ से अपना फ़िल्मी कैरियर शुरू करने का निर्णय लिया। उन्हें लेकिन हिन्दी नहीं आती थी यह एक बहुत बड़ी कठिनाई थी। इस कारण उन्होंने कम ही फ़िल्मों में काम किया। उनकी उल्लेखनीय फ़िल्में हैं – सुनील दत्त के साथ ‘यह रास्ते हैं प्यार के‘, जाॅय मुखर्जी के साथ ‘उम्मीद‘ और प्रदीप कुमार के साथ ‘बाग़ी‘।

‘अनुराधा’ में संगीत देने के लिये शंकर जयकिशन तैयार थे। हृषिकेश मुखर्जी की पिछली फ़िल्म ‘अनाड़ी’ में उनके गाने सुपरहिट रहे थे। बाहर की फ़िल्मों में वे उस समय 25,000/-रुपये चार्ज कर रहे थे पर हृषि दा की फ़िल्म वे 10,000/- रुपये में करने राज़ी थे। पर फ़िल्म में गानों की संख्या कितनी होगी इस बात पर हृषि दा से एकमत न होने से उन्होंने यह फ़िल्म छोड़ दी।  फिर लता मंगेशकर ने ‘अनुराधा’ में संगीत देने के लिये हामी भर दी। पर एक दिन वे हृषिकेश मुखर्जी के पास पहुँची और कहा, ‘मैंने किसी से वादा किया था कि जब हिन्दी फ़िल्मों में संगीत दूँगी तो सबसे पहले उनकी फ़िल्म करूँगी। अब मैं क्या करूँ?’ हृषिदा ने कहा, ‘तुम अपना वादा निभाओ।’

हृषिकेश मुखर्जी से पंडित रवि शंकर के पहले से बड़े अच्छे सम्बन्ध थे। वे ‘अनुराधा’ में संगीत देने तैयार हो गये। इससे पहले वे चेतन आनन्द की ‘नीचा नगर‘ और ख़्वाज़ा अहमद अब्बास की ‘धरती के लाल‘ फ़िल्मों में संगीत दे चुके थे। बाद में उन्होंने ‘गोदान‘ और ‘मीरा‘ फ़िल्मों का भी संगीत निर्देशन किया। ‘अनुराधा’ में लता मंगेशकर के एक से बढ़ कर एक सुरीले गीत थे – साँवरे साँवरे काहे करो मोसे जोराजोरी, कैसे दिन बीते कैसे बीतीं रतियां, हाय रे वो दिन क्यूँ न आये और वह गीत जो ‘आज के गीत’ के रूप में आपके सामने हाज़िर है –

जाने कैसे सपनों में खो गयीं अँखियाँ
मैं तो हूँ जागी मोरी सो गयीं अँखियाँ

साभार:- श्री रवींद्रनाथ श्रीवास्तव जी।

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