Satyakam

फ़िल्म – सत्यकाम
निर्देशन – हृषिकेश मुखर्जी
कहानी – नरेंद्र सान्याल
संवाद – राजिंदर सिंह बेदी
कलाकार – धर्मेन्द्र, अशोक कुमार, संजीव कुमार ,शर्मीला टैगोर,डेविड

धर्मेन्द्र का नाम सुनते ही ज़ेहन में जो छवि आती है उससे बिलकुल जुदा है सत्यकाम. नरेंद्र सान्याल के बंगाली उपन्यास पर बनी ये फिल्म ना सिर्फ उस समय अपितु आज भी उतनी ही सामायिक है. ऋषिकेश मुखर्जी के निर्देशन और राजिंदर सिंह बेदी जैसे महान लेखक के संवादों से सजी सत्यकाम सिर्फ एक फिल्म नहीं, ये एक ऐसा आईना है जो हमारे समाज और सिस्टम की सबसे भद्दी शक्ल दिखाता है.

ये कहानी है सत्यप्रिय आचार्य नाम के एक आदर्शवादी इंजिनियर की. जिसने आज़ादी के समय बहुत से सपने देखे थे, ये वो सपने थे जो आज भी आपके और हमारे जैसे लोग देखते है. लेकिन अफ़सोस इन सपनों को पूरा होते देखने कि चाह में सिस्टम से सिर्फ सच्चाई, ईमानदारी और आदर्शों के हथियार से लड़ता सत्यप्रिय आचार्य भी एक दिन निगल लिया जाता है और उसी की तरह आज भी ना जाने कितने सत्यकाम इस खोखले हो चुके भ्रष्ट सिस्टम और समाज से अकेले लड़ते लड़ते दम तोड़ देते है. सत्यकाम एक ऐसी कहानी है जो एक बार देख लेने के बाद हमारा हिस्सा बन जाती है उस घाव कि तरह जिसके साथ हमें तमाम उम्र जीना पड़ता है. सत्यकाम हमारी चाह कर भी कुछ ना कर सकने कि व्यथा को जगा देती है.

Dharmendra- Rare & Unseen Photos

इस फिल्म कि शुरुआत होती है आज़ादी के सपने देखते युवा से जो अपने दिल में कई तरह कि कल्पनाएँ सजाये बैठा है. फिर आज़ादी का दिन भी आता है लेकिन अफ़सोस सिर्फ झंडा बदलता है शासन का खोखलापन वही रहता है. इस उम्मीद में कि बदलने के लिए उसे ही आगे आना होगा नायक जीवन के हर कदम पर लड़ता है लेकिन उसे कुछ हासिल नहीं होता. धीरे धीरे उसका साथ देने वाले साथी भी ना चाहते हुए उसी तंत्र का एक हिस्सा बन जाते है जिस तंत्र को बदलने के सपने वो आज़ादी से पहले देखते थे.
फिल्म के अंत में नायक अपनी ही आदर्शवादिता से कभी कभी कुंठित भी लगता है. जब कैंसर से नायक कि मौत होती है तो लगता है कि वो कैंसर नायक को नहीं पूरे देश को सिस्टम बनकर निगल गया है. अदाकारी के लिहाज़ से तो ये फिल्म धर्मेन्द्र कि सबसे बेहतरीन फिल्म थी ही, निर्देशन के हिसाब से भी ये ऋषिकेश मुखर्जी का सर्वश्रेष्ठ कार्य था.

इन सबके अलावा फिल्म का जो सबसे मज़बूत पहलु था वो थे राजिंदर सिंह बेदी के संवाद. जरा एक नज़र इन संवादों पर डालिए ऐसा लगेगा कि किसी ने शीशे की तरह पिघला हुआ सच कानों में ही नहीं दिल में भी उतार दिया है. जैसे कि ये दृश्य जिसमे सत्यप्रिय झुकने से इनकार करते है और कहते है

“मैं इंसान हूं। भगवान की सबसे बड़ी सृष्टि मैं उसका प्रतिनिधि हूं किसी अन्याय के साथ कभी सुलह नहीं करूंगा, कभी नहीं करूंगा” देखिये ये दृश्य

इसी तरह एक अन्य दृश्य में ठेकेदार सत्यप्रिय के लिए कहता है. “ये आदमी बहुत ही बदमाश और पाजी है … रिश्वत वगैरह नहीं खाता” उस समय ईमानदार को पाजी कहते थे और आजकल बेवकूफ, जमाना भले ही बदल गया है लेकिन आज भी सत्यकाम का हश्र वही होता है जो उस समय हुआ था. इसी तरह इस फिल्म का एक गीत सुनने में तो मजाकिया लगता है पर बहुत गहरी बात कह देता है.

ये गीत है “आदमी है क्या बोलो आदमी है क्या

सत्यकाम फिल्म की परिणीती भी फिल्म के नायक सत्यप्रिय आचार्य जैसी ही हुई. एक अति आदर्शवादी और समाज और सिस्टम का सच दिखाने वाली इस फिल्म को दर्शकों ने नकार दिया. बकौल हृषिकेश मुखर्जी ये उनकी सबसे सर्वश्रेष्ठ फिल्म थी और इसके असफलता के बाद भी उन्होंने अपनी हर फिल्म में थोडा थोड़ा सत्यकाम को ही दिखाया था. इस फिल्म में धर्मेन्द्र के साथ सहायक भूमिकाओं में संजीव कुमार, शर्मीला टैगोर, अशोक कुमार और डेविड थे. हर एक अदाकार ने अपने किरदार को बखूबी निभाया था लेकिन धर्मेन्द्र को देखकर तो ऐसा लगा कि उन्होंने सत्यप्रिय आचार्य के किरदार को जिया था.

Sanjeev Kumar- An Actor Amongst The Stars, A Character Amongst Caricatures

एक वाक्य में कहें तो समाज और सिस्टम की जड़ों में बसे भ्रष्टाचार, लालच से लड़ते हुए आदर्शों के मरने और सपनों के बिखरने कि कहानी है सत्यकाम. सत्यकाम फिल्म देखने के लिए लिंक-

लेखकः योगेश पारीख 

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