गीत – हुस्न की बारात चली मौसमे बहार में
फ़िल्म – मुग़ले आज़म
संगीतकार – नौशाद
गीतकार – शकील बदायूंनी
गायिकायें – मुबारक बेग़म, शमशाद बेग़म , लता मंगेशकर

मुबारक बेग़म साहिबा को विनम्र श्रद्धांजलि –

भारतीय सिने संगीत के स्वर्णयुग की साक्षी और उसमें अपना यथायोग्य योगदान देने वाली एक समर्थ गायिका मुबारक बेग़म कल सोमवार 18 जुलाई को जन्नतनशीन हो गयीं। उनकी यादों को सादर नमन। मुबारक बेग़म ने अपना पहला फ़िल्मी गीत -‘मोहे आने लगी अँगड़ाई’ फ़िल्म ‘आइये‘ (1949) में संगीतकार शौक़त हैदरी के संगीत निर्देशन में गाया था। शौक़त हैदरी ने बाद में ‘नाशाद‘ के नाम से भी कई फ़िल्मों में संगीत दिया था। अपने पहले गीत में मुबारक बेग़म की गायकी में सुरैया का असर दिखलाई देता है। अपने एक इंटरव्यू में उन्होंने बताया था कि वे सुरैया के गायन से अत्यन्त प्रभावित थीं। फ़िल्म ‘आइये’ में मुबारक बेग़म और लता मंगेशकर का एक युगलगीत भी था -‘आओ चले वहाँ, बोलो चले कहाँ’।

कमाल अमरोही की फ़िल्म ‘दायरा‘ (1953) में मुबारक बेग़म को एक अच्छा अवसर मिला था। इस फ़िल्म में मीना कुमारी और नासिर खान (दिलीप कुमार के भाई) अभिनय कर रहे थे। संगीत जमाल सेन का था। जमाल सेन के पुरखे तानसेन के शिष्य रह चुके थे अत: सब नाम के साथ ‘सेन’ लगाते थे। उनकी अगली पीढ़ी के शम्भु सेन, दिलीप सेन – समीर सेन संगीत की परम्परा को आगे बढ़ा रहे हैं। ‘दायरा’ में मुबारक बेग़म के सात गीत थे। फ़िल्म असफल हो जाने से उन्हें बड़ा झटका लगा। इस फ़िल्म का एक टैण्डम सांग -‘देवता तुम हो मेरा सहारा, मैंने थामा है दामन तुम्हारा’ मुबारक बेग़म और मोहम्मद रफ़ी की आवाज़ में एक मर्मस्पर्शी भक्तिगीत है, जिसे क़ैफ़ भोपाली ने लिखा है। 1953 में आई फ़िल्म -‘सबसे बड़ा रुपय्या‘ में मुबारक बेग़म ने एक छोटा सा रोल भी किया था। फ़िल्म संगीत जगत में व्याप्त राजनीति के कारण मुबारक बेग़म को बड़ी फ़िल्मों में गाने के अवसर सीमित मिले। ‘कभी तनहाइयों में यूँ हमारी याद आयेगी‘ तथा ‘मुझको अपने गले लगा लो, अय मेरे हमराही‘ ये दो अत्यन्त मशहूर गीत हैं जो मुबारक बेग़म का नाम लेते ही याद आ जाते हैं। अन्यथा वे बी और सी ग्रेड की फ़िल्मों और मुजरा गीतों के मकड़जाल में ताउम्र फँसी रहीं। ज़िन्दगी में आर्थिक कठिनाइयाँ भी ख़ूब झेलनी पड़ी।

उनके कुछ मशहूर गीत हैं – वो ना आयेंगे पलट के, उन्हें लाख हम बुलायें (देवदास), हम हाले दिल सुनायेंगे, सुनिये कि ना सुनिये (मधुमती), निगाहों से दिल में चले आइयेगा (हमीर हठ), कुछ अजनबी से आप हैं, कुछ अजनबी से हम (शगुन) , आँखों आँखों में हर एक रात गुज़र जाती है (मारवल मैन), बेमुरव्वत बेवफ़ा बेगाना ए दिल आप हैं (सुशीला) वग़ैरह।

फ़िल्म ‘मुग़ले आज़म’ के लिये मुबारक बेग़म, शमशाद बेग़म और लता मंगेशकर की आवाज़ों में एक क़व्वाली रिकार्ड की गयी थी लेकिन किन्हीं कारणों से उसे फ़िल्म में नहीं रखा गया था। मुबारक बेग़म को इस बात का बड़ा अफ़सोस रहा। शकील बदायूंनी और नौशाद की वह क़व्वाली है –

हुस्न की बारात चली मौसमे बहार में, दिल का चमन, बन के दुल्हन, हो के मगन, झूम उठा प्यार में।

साभार:- श्री रवींद्रनाथ श्रीवास्तव जी

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