गीत – जिस रात के ख़्वाब आये
वो ख़्वाबों की रात आई
फ़िल्म – हब्बा खा़तून (अप्रदर्शित, 1979)
संगीतकार – नौशाद
गीतकार – अली सरदार जाफ़री
गायक – मोहम्मद रफी

हब्बा खा़तून सोलहवीं सदी में कश्मीर की एक बेहद मशहूर कवियित्री हुईं। उनके लिखे गीत आज भी वहाँ के जनमानस के बीच बड़े लोकप्रिय हैं। उन्हें ‘कश्मीर की मीरा’ या ‘कश्मीर की बुलबुल’ कह कर याद किया जाता है। श्रीनगर के पास एक छोटे से गाँव में जन्मी हब्बा खा़तून का बचपन का नाम ज़ूनी था। ‘ज़ून’ अर्थात् चाँद। वे चाँद के समान ख़ूबसूरत जो थीं। गाँव के मौलवी से शिक्षा ले कर वे जल्दी ही गीत रचने लगीं। पिता ने कमउम्र में गाँव के एक अनपढ़ बढ़ई से उनका निकाह कर दिया। गँवार शौहर और सास को ज़ूनी का गीत लिखना और गाना पसंद नहीं था। शौहर और ससुराल से मिली तकलीफ़ों को भी उन्होंने गीतों में उतार दिया। वह बेमेल ब्याह जल्द ही तलाक़ तक पहुँच गया।
एक बार जब वे गाँव के बाहर पेड़ के नीचे बैठी अपने गीत गा रहीं थीं तब उन्हें कश्मीर के शहज़ादे यूसुफ़ शाह चक ने देख लिया। वे उनकी ख़ूबसूरती और गले की मिठास पर दीवाने हो गये। शहज़ादे के पिता के विरोध के बावज़ूद ज़ूनी और यूसुफ़ की शादी हो गयी। यूसुफ़ शाह चक के कश्मीर के राजा बनने के बाद ज़ूनी को हब्बा खा़तून के नाम से जाना जाने लगा। लेकिन ख़ुशी के दिन ज़्यादा न रहे। शहंशाह अकबर ने यूसुफ़ को बहाने से दिल्ली बुला कर गिरफ़्तार कर लिया और बिहार के जेल में डाल दिया। अपनी मृत्यु तक वे वहीं बन्द रहे। पति वियोग में हब्बा खा़तून महलों के सुख छोड़ कर कश्मीर की वादियों में भटकती हुई सारी ज़िन्दगी विरह के गीत गाती रहीं।

‘हब्बा खा़तून’ की इस कहानी पर दो बार फ़िल्में बनना शुरू हुईं और दोनों बार अधूरी रह गयीं। 1989 के आसपास मुज़फ़्फ़र अली, डिम्पल कपाड़िया और विनोद खन्ना को ले कर ‘ज़ूनी’ फ़िल्म बना रहे थे जो कश्मीर की अशांति की वजह से अधूरी रह गयी। उससे लगभग दस बरस पहले बी आर चोपड़ा ‘हब्बा खा़तून’ ( 1979 ) फ़िल्म बना रहे थे। उसमें ज़ीनत अमान और संजय खान शीर्ष भूमिकाओं में थे। संगीत नौशाद दे रहे थे । उन्होंने इस फ़िल्म के लिये मोहम्मद रफ़ी की आवाज़ में एक गीत रिकार्ड किया था। उस गीत व मोहम्मद रफ़ी साहब से जुड़ी यादों को नौशाद साहब ने एक इंटरव्यू में कुछ इस तरह से बताया था —

एक ग़ज़ल मैंने बनाई फ़िल्म ‘हब्बा खा़तून’ के लिये, फ़िल्म जो बन ना सकी। मोहम्मद रफ़ी साहब को मैंने जब बुलाया और ये ग़ज़ल सुनाई तो देखा कि वो रो रहे हैं। मैंने पूछा ,’क्या हुआ रफ़ी साहब ? ‘कहने लगे,’राग पटदीप में जो आपने ये ग़ज़ल बनाई, मुझे बहुत अच्छी लगी। आजकल जो गाने मैं गा रहा हूँ वो सिर्फ़ गले तक उतरते हैं, दिल तक नहीं उतरते। क्या हो गया है ज़माने को?’ मैंने कहा,’ जाने दीजिये। छोड़िये। कहाँ जज़्बात में पड़ गये। रिहर्सल कीजिये।’

वे कई दिनों तक रिहर्सल करते रहे। फिर जब ये गाना रिकार्ड हुआ तब गाना रिकार्ड होने के बाद रफ़ी साहब मुझसे लिपट कर रोने लगे। मैंने कहा,’ क्या हो गया है आपको आजकल? ज़्यादा जज़्बाती हो गये हैं आप। चलिये पैसे ले लीजिये इसके।’

‘ये गाना गा कर मुझे जो ख़ुशी हासिल हुई है वह पैसे से थोड़े ही पूरी होगी। पैसे से कहीं ज़्यादा ये ख़ुशी है। मैं पैसे नहीं लूँगा, मैं पैसे नहीं लूँगा’, कहते हुये वे चले गये। इत्तफ़ाक़ ये था कि उनकी ज़िन्दगी का मेरे साथ यह आख़री गाना था।

जिस रात के ख़्वाब आये
वो ख़्वाबों की रात आई
शरमा के झुकीं नज़रें
होंठों पे वो बात आई।

साभार:- श्री रवींद्रनाथ श्रीवास्तव जी।

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