गीत – मैं ये सोच कर उसके दर से उठा था
फ़िल्म – हक़ीक़त (1965)
संगीतकार – मदनमोहन
गीतकार – कैफ़ी आज़मी
गायक – मोहम्मद रफ़ी

फ़िल्म ‘हक़ीक़त’ (1965) में चेतन आनन्द और मदनमोहन ने पहली बार साथ काम किया था। उसके बाद तो उनका साथ मदनमोहन साहब के दुनिया से कूच करने तक रहा। हीर रांझा, हँसते ज़ख़्म, हिन्दुस्तान की क़सम, साहब बहादुर आदि उनकी संयुक्त संगीत यात्रा के विभिन्न पड़ाव हैं । भारत – चीन युद्ध पर आधारित ‘ हक़ीक़त ‘ में मदनमोहन ने बेमिसाल गीत पेश किये थे। हर गीत एक बेशक़ीमती नगीना था। मोहम्मद रफ़ी की गायी नज़्म -‘मैं ये सोच कर उसके दर से उठा था, कि वो रोक लेगी, मना लेगी मुझको’, सीधे आपके दिल की गहराई में उतर जाने वाली एक अनूठी रचना है।

इस गीत में कोई मुखड़ा/स्थायी या अन्तरा नहीं है। अंतिम पंक्ति को छोड़ कर कोई अन्य पंक्ति दोहराई नहीं गयी है। यह नज़्म कैफ़ी आज़मी की एक पर्सनल नज़्म थी। एक दफ़ा उनकी अपनी बेग़म शौक़त आज़मी से कुछ कहासुनी हो गयी थी। उस वक़्त उनके दिल में घुमड़ते जज़्बात इस नज़्म में ढल गये थे।

पहले यह नज़्म फ़िल्म ‘पंचायत’ (1958) के लिये संगीतकार इक़बाल क़ुरैशी ने मोहम्मद रफ़ी की आवाज़ में रिकार्ड की थी। निर्देशक लेखराज भाकरी की फ़िल्म ‘पंचायत’ में मुख्य सितारे थे- राजकुमार, मनोज कुमार, श्यामा और जबीन जलील। ‘ता थैया करके आना ओरे जादूगर मोरे सैंया'(गीतादत्त, लता मंगेशकर), हाल ये कर दिया ज़ालिम तेरे तड़पाने ने’ (मोहम्मद रफ़ी, गीता दत्त) जैसे मीठे गीत इस फ़िल्म में थे। फ़िल्म के सारे गीत शकील नूमानी ने लिखे थे सिवाय इस नज़्म के जो कैफ़ी आज़मी साहब की थी। लेकिन ‘ पंचायत ‘ के लिये रिकार्ड हुआ यह गाना अब कहीं उपलब्ध नहीं है।

चेतन आनन्द को यह नज़्म भा गयी थी। उन्होंने इसे ‘ हक़ीक़त ‘ में शामिल करने के लिये अभिनेता सुधीर और चाँद उस्मानी के पात्र गढ़े। सुधीर, जो एक फ़ौजी के किरदार में थे, की प्रेमिका चाँद उस्मानी किसी बात पर उनसे नाराज़ हो जाती हैं और उन्हें लद्दाख सीमा पर युद्ध में आना पड़ जाता है। लद्दाख की उजाड़ पहाड़ियों पर प्रेमिका के पत्र की नाकाम प्रतीक्षा में यह गीत सामने आता है। गीत में जो वायलिन के करुण हिस्से हैं वे सीधे कलेजे में उतर जाते हैं। यह वायलिन प्यारेलाल जी (लक्ष्मी – प्यारे वाले) ने बजाई थी।

जब सुधीर युद्धभूमि में लड़ते हुये वीरगति को प्राप्त होते हैं तब उनकी खुली हुयी पथराई आँखें प्रेयसी के संदेश की प्रतीक्षा करती प्रतीत होती हैं। यहाँ बैकग्राउंड में इस गीत का हिस्सा ‘यहाँ तक कि उससे जुदा हो गया मैं, जुदा हो गया मैं’ गूँजता है तो हर दर्शक की आँखें नम कर जाता है।

साभार:- श्री रवींद्रनाथ श्रीवास्तव जी।

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