गीत – मुझे तुमसे मोहब्बत है मगर मैं कह नहीं सकता
मगर मैं क्या करूँ बोले बिना भी रह नहीं सकता
फ़िल्म – बचपन (1963)
संगीतकार – सरदार मलिक
गीतकार – हसरत जयपुरी
गायक – मोहम्मद रफी

पचास एवं साठ के दशक में डेज़ी ईरानी और हनी ईरानी इन दो बाल कलाकारों का बड़ा बोलबाला था। दोनों लड़कियाँ थीं पर अधिकांश फ़िल्मों में उन्हें लड़कों की तरह प्रस्तुत किया गया। डेज़ी ने ढाई साल की उम्र से काम करना शुरू किया था। वे आज भी छिटपुट रोल में नज़र आ जाती हैं। ‘शीरीं फरहाद की तो निकल पड़ी‘ फ़िल्म में वे बोमन ईरानी की माँ बनी हैं। बाल कलाकार के रूप में उनकी कुछ उल्लेखनीय फ़िल्में हैं – हम पंछी एक डाल के, एक ही रास्ता, नया दौर, क़ैदी नम्बर 911, ज़मीन के तारे, जागते रहो इत्यादि। उन्हें उनकी माँ की महत्वाकांक्षा के कारण फ़िल्मों में काम करना पड़ा। इस कारण उन्हें नियमित स्कूली शिक्षा भी नहीं मिली। वयस्क होने पर उनकी पहली फ़िल्म ‘आरज़ू‘ (राजेन्द्र कुमार, साधना) थी। जिसमें उन पर नाज़िमा के साथ ‘जब इश्क़ कहीं हो जाता है, तब ऐसी हालत होती है‘ क़व्वाली फ़िल्माई गयी थी। माँ के दबाव के कारण उन्हें काम करना पड़ रहा था पर ज़ल्दी ही उन्होंने लेखक के के शुक्ला से विवाह कर लिया।

के के शुक्ला एक माने हुये स्क्रीनप्ले राइटर थे। मनमोहन देसाई की अधिकांश फ़िल्मों के स्क्रीनप्ले उनके द्वारा लिखे गये। उनकी लिखी कुछ हिट फ़िल्में हैं – अमर अकबर एन्थोनी, मर्द, क़ुली, नसीब, सुहाग, परवरिश, अल्लारक्खा, तूफ़ान, गंगा जमना सरस्वती वग़ैरह। के के शुक्ला का देहान्त हो चुका है। डेज़ी ने नये कलाकारों को अभिनय सिखाने के लिये स्कूल खोला था । बीच बीच में वे आस्था, क्या कहना जैसी फ़िल्मों में यदाकदा अभिनय करती भी दिखलाई पड़ीं।

डेज़ी ईरानी पारसी परिवार में पैदा हुई थीं। उनके बचपन में ही उनकी माँ ने इस्लाम धर्म स्वीकार कर लिया था। जब डेज़ी की शादी के के शुक्ला से हुई तो वे हिन्दू बन गयीं। एक समय ज़िन्दगी में वे बहुत ज़्यादा सिगरेट पीने लगी थीं। उन दिनों मानसिक तनाव की स्थिति से उन्हें शांति प्रभु यीशु के शरण में जाने से हुई तथा उन्होंने ईसाई धर्म अपना लिया। उनके अनुसार उसके बाद धूम्रपान की बुरी आदत से उन्हें मुक्ति मिल गयी। अपने जीवन में इतने प्रमुख धर्म अपनाने वाले उदाहरण बिरले ही होंगे।

पेरिन ईरानी और नोशीर ईरानी की पाँच संतानों में हनी ईरानी सबसे छोटी हैं। बहन डेज़ी की तरह उन्हें भी उनकी माँ ने फ़िल्मों की दुनिया में पहुँचा दिया था। हनी की बाल कलाकार के रूप में प्रमुख फ़िल्में हैं – चिराग़ कहाँ रोशनी कहाँ, बाम्बे का चोर, प्यार की प्यास, अमर रहे ये प्यार आदि। बड़े हो कर उन्होंने कटी पतंग, अमर प्रेम, सीता और गीता आदि फ़िल्मों में छोटी मोटी भूमिकायें कीं। फिर जावेद अख़्तर (सलीम जावेद) से विवाह कर अभिनय को उन्होंने तिलांजलि दे दी। उनकी दोनों सन्तानें फरहान अख़्तर और ज़ोया अख़्तर आज फ़िल्मी दुनिया के जानेमाने नाम हैं। जावेद अख़्तर से अलग होने के बाद उन्होंने कहानी एवं स्क्रीनप्ले लिखने में अपना जौहर दिखलाया। उनकी लिखी चर्चित फ़िल्में हैं – आइना , लम्हे , क्या कहना , परम्परा , डर , अरमान आदि। ‘अरमान ‘ का उन्होंने निर्देशन भी किया था।

डेज़ी और हनी के बड़े भाई सरोश ईरानी हैं। इन्होंने भी बतौर चाइल्ड आर्टिस्ट पाँच फ़िल्में की थीं। फ़िल्म ‘सौतेला भाई‘ में उन्होंने गुरुदत्त के बचपन का रोल निभाया था। इसके अलावा मासूम, आरती, मनमौजी और गृहस्थी फ़िल्मों में वे दिखलाई पड़े। बड़े हो कर वे सहायक निर्देशक बन गये। वतन से दूर, चालबाज़, ऐसा भी होता है आदि फ़िल्मों के सहायक निर्देशक के रूप में काम करने के बाद उन्होंने फ़िल्मी दुनिया से बिदाई ले ली। अब वे अपने भाई बनी ईरानी के साथ ईरानी होटल चलाते हैं। भाई बनी ईरानी ने कभी किसी फ़िल्म में काम नहीं किया।

इन सबकी बड़ी बहन हैं – मेनका ईरानी। इनकी माँ पी एन ईरानी ने 1963 में एक फ़िल्म ‘बचपन’ प्रोड्यूस की थी, मेनका को इण्ट्रोड्यूस करने के लिये। उस फ़िल्म के हीरो सलीम थे । वही  ‘सलीम-जावेद‘ वाले प्रसिद्ध लेखक और सलमान खान के पिता। फ़िल्म का निर्देशन नज़र कर रहे थे लेकिन कुछ मतभेद हो जाने से फ़िल्म अधूरी छोड़ वे अलग हो गये। नज़र के अलग हो जाने पर स्टण्ट फ़िल्मों के हीरो, निर्माता, निर्देशक कामरान की मदद से वह फ़िल्म पूरी हो कर प्रदर्शित हुई पर टिकट खिड़की पर असफल रही। फ़िल्म के प्रिण्ट्स अब उपलब्ध नहीं हैं।

मेनका ईरानी ने कामरान से शादी करने के बाद किसी और फ़िल्म में अभिनय नहीं किया। उनके दो बच्चे फरहा खान और साजिद खान आजकल चर्चित और सफल नाम हैं।
‘बचपन’ के संगीतकार सरदार मलिक तथा गीतकार हसरत जयपुरी आपस में रिश्तेदार हैं। हसरत जयपुरी की बहन से सरदार मलिक की शादी हुई थी। सरदार मलिक के बेटे अन्नू मलिक ने कई हिट फ़िल्मों में संगीत दिया।

‘बचपन’ के दो गीत बड़े मशहूर हुये। रफ़ी और सुमन कल्याणपुर का गाया ‘तेरे हम ओ सनम, तू जहाँ मैं वहाँ, सूरज तू ज़र्रा मैं, तू कहाँ मैं कहाँ‘। दूसरा रफ़ी साहब का गाया सोलो – ‘मुझे तुमसे मोहब्बत है मगर मैं कह नहीं सकता‘।

साभार:- श्री रवींद्रनाथ श्रीवास्तव जी एवं श्री पवन झा यूट्यूब चैनल 

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