तुमसा नहीं देखा (1957)

गीत – यूँ तो हमने लाख हसीं देखे हैं , तुमसा नहीं देखा
फ़िल्म – तुमसा नहीं देखा (1957)
संगीतकार – ओ पी नय्यर
गीतकार – साहिर लुधियानवी
गायक – मोहम्मद रफ़ी / आशा भोंसले

अक्षय मनवानी ने निर्माता निर्देशक नासिर हुसैन की फ़िल्मों का गहन विश्लेषण करती हुई एक किताब लिखी है। उनका विचार है कि मुख्य धारा की फ़ार्मूला या मसाला फ़िल्मों को समालोचक और तथाकथित बुद्धिजीवी वर्ग सदा हेय दृष्टि से देखते हैं। जब कि लम्बे समय तक सिनेमा का मतलब ही मनोरंजक मसाला फ़िल्में होती थीं। दर्शकों का एक बड़ा वर्ग इन फ़िल्मों का दीवाना था। इस क़िस्म की हिट फ़िल्में बनाने वालों में नासिर हुसैन का नाम प्रमुखता से उभर कर सामने आता था।

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निर्देशक बनने से पहले नासिर हुसैन लेखक के रूप में अपनी पहचान क़ायम कर चुके थे। वे फ़िल्मिस्तान से जुड़े थे। अनारकली (1953) की कहानी, मुनीम जी (1955) और  पेइंग गेस्ट (1957) के स्क्रीनप्ले और संवाद वे लिख चुके थे । उसके बाद उन्हें फ़िल्मिस्तान से पहली फ़िल्म ‘ तुमसा नहीं देखा ‘ ( 1957 ) निर्देशन के लिये मिली । उस समय फ़िल्मिस्तान के कर्ताधर्ता तोलाराम जालान थे जिन्होंने कई सारी शर्तें लगा रखीं थीं । नायिका के रूप में अमिता को लेना अनिवार्य था । बजट एकदम सीमित दिया गया था । नासिर हुसैन के काम में वे हमेशा कमियाँ निकालते रहते थे । ‘ मुनीम जी ‘ और ‘ पेइंग गेस्ट ‘ के दौरान बने सम्बंधों के कारण पहले देव आनन्द नायक बनने वाले थे । पर उन्होंने अमिता के साथ हीरो बनने से इंकार कर दिया । उसके बाद शम्मी कपूर को नायक के तौर पर साइन किया गया । उनके नाम के साथ तब फ़्लॉप फ़िल्मों की एक लम्बी लिस्ट जुड़ी हुयी थी । सीमित साधनों और आर्थिक दिक़्क़तों से जूझते हुये नासिर हुसैन ने फ़िल्म पूरी की । रिलीज़ से पहले फ़िल्म देखने के बाद तोलाराम जालान की प्रतिक्रिया थी , ” वाहियात फ़िल्म बनाई है । लोग चप्पल मारेंगे । ” नासिर हुसैन का निराश होना स्वाभाविक था । फिर भी उन्हें लगता था कि ठीकठाक फ़िल्म बनी है । आठ दस हफ़्ते तो चल जाना चाहिये । फ़िल्म जब प्रदर्शित हुयी तो दर्शकों ने उसे हाथोंहाथ लिया । वह एक जुबली हिट साबित हुयी । शम्मी कपूर एक बाग़ी कलाकार के रूप में उभर कर सामने आये।

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‘तुमसा नहीं देखा’ में ओ पी नय्यर का संगीत था । गीत साहिर लुधियानवी लिख रहे थे । उन दिनों ही गुरुदत्त ‘ प्यासा ‘ बना रहे थे । ‘ प्यासा ‘ के गीत भी साहिर लिख रहे थे और वे ‘ प्यासा ‘ की कहानी और गुरुदत्त की कार्यशैली से बेतरह प्रभावित थे । नासिर हुसैन जब ‘ तुमसा नहीं देखा ‘ के गानों की सिचुएशन साहिर को समझाते तो साहिर ‘प्यासा ‘ का उदाहरण देते कि क्या लाजवाब गीत वे उसमें लिख रहे थे । नासिर हुसैन उनसे अपनी कहानी के अनुरूप गानों की मांग रखते थे और साहिर ‘ प्यासा ‘ के क़सीदे पढ़ कर उन्हें छोटा साबित करना जारी कर देते । तंग आ कर नासिर हुसैन ने कह दिया , ” वे ( गुरुदत्त ) अपनी तरह की फ़िल्म बना रहे हैं और मैं अपने तरह की अलग फ़िल्म बना रहा हूँ । मेरी ज़रूरत कुछ और है । मुझे अपने हिसाब के गाने चाहिये।”

साहिर साहब को नासिर हुसैन का बोलने का अन्दाज़ पसन्द नहीं आया । वे फ़िल्म से अलग हो गये । उस समय तक उन्होंने फ़िल्म का केवल एक ( शीर्षक ) गीत लिखा था – ‘ यूँ तो हमने लाख हसीं देखे हैं , तुमसा नहीं देखा ।’ साहिर साहब के अलग होने के बाद ‘ तुमसा नहीं देखा ‘ के बाक़ी सारे गीत मजरूह सुल्तानपुरी ने लिखे। ‘प्यासा’ के प्रदर्शन के बाद गानों की सफलता का श्रेय लेने की होड़ में साहिर लुधियानवी व सचिनदेव बर्मन के बीच अहं की दीवार खड़ी हो गयी । गुरुदत्त ने प्यासा के बाद अपनी फ़िल्मों में साहिर से गीत नहीं लिखवाये।

साभार:- श्री रवींद्रनाथ श्रीवास्तव जी।

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