गीत – एहसान तेरा होगा मुझ पर,
दिल चाहता है मुझे कहने दो
फ़िल्म – जंगली (1961)
संगीतकार – शंकर जयकिशन
गीतकार – हसरत जयपुरी
गायक – लता मंगेशकर/मोहम्मद रफ़ी

शम्मी कपूर की फ़िल्मों की सफलता में उन फ़िल्मों के लोकप्रिय संगीत का बहुत बड़ा योगदान था। ओ पी नय्यर (तुमसा नहीं देखा, कश्मीर की कली), उषा खन्ना (दिल देके देखो), आर डी बर्मन (तीसरी मंज़िल) आदि सभी संगीतकारों ने हिट गाने दिये थे। लेकिन उनके प्रिय संगीतकार शंकर जयकिशन थे। उनकी 22 फ़िल्मों में शंकर जयकिशन का संगीत था। जयकिशन शम्मी कपूर के अधिक निकट थे। दोनों में गहरी आपसी समझ थी। इस कारण ही शम्मी कपूर पर फ़िल्माये गये गीतों में 90% गीत (शंकर जयकिशन के संगीत में) जयकिशन द्वारा तैयार किये गये थे। शंकर और जयकिशन दोनों ही प्रतिभा के धनी थे पर जयकिशन और शम्मी कपूर की निजि जीवन में घनिष्ठता के कारण ऐसा संभव हुआ। मोहम्मद रफ़ी और शम्मी कपूर के बीच भी अच्छी ट्यूनिंग थी। रफ़ी साहब बिना बताये समझ जाते थे कि शम्मी कपूर क्या चाहते हैं और किस तरह से वे गाने पर्दे पर पेश करेंगे। वे उसी तरह अपनी गायकी में वे अदायें भर देते थे।

जयकिशन ने फ़िल्म ‘जंगली’ (1961) के लिये जब ‘एहसान तेरा होगा मुझ पर’ गीत तैयार किया, उस समय शम्मी कपूर विदेश में थे। जयकिशन उनके लौटने का इंतज़ार न कर सके । उन्होंने फ़ोन पर शम्मी कपूर को वह धुन बजा कर सुनाई । उन्हें पसंद आने पर वह गीत रफ़ी साहब की आवाज़ में रिकार्ड किया गया।

फ़िल्म में पहले यह गीत केवल मोहम्मद रफ़ी की आवाज़ में ही प्लान किया गया था। लेकिन फिर तय किया गया कि इसे बतौर टैण्डम सांग इस्तेमाल किया जायेगा और स्वप्न दृश्य के रूप में सायरा बानो पर भी फ़िल्माया जायेगा। चूँकि महिला स्वर में गीत तैयार नहीं था अतएव सायरा बानों पर शूटिंग रफ़ी साहब के गाये वर्शन पर ही की गयी।

जब लता मंगेशकर को कट फ़िल्म का वह हिस्सा दिखलाया गया जिसमें मोहम्मद रफ़ी के गाने पर सायरा बानो होंठ हिला रहीं थीं, तो उन्हें सब कुछ बड़ा मज़ेदार लगा। लेकिन जब उन्हें वह गीत रिकार्ड करना पड़ा तो थोड़ी कठिनाई हुई। चूँकि गाने की शूटिंग रफ़ी साहब के वर्शन के साथ हो चुकी थी अत: लता जी को बिल्कुल मोहम्मद रफ़ी जैसा गाना था। एक तरह से जब लता मंगेशकर ने गाना रिकार्ड किया तो उन्होंने मोहम्मद रफ़ी के गाये गीत को ‘डमी ट्रैक’ की तरह इस्तेमाल किया। गाने में कई ‘हाई नोट्स’ थे। पुरुष गायकों की रेंज सामान्यतः ‘हाई’ होती है और रफ़ी साहब जैसा ऊँचे ‘आक्टेव’ में गाना आसान नहीं था। लेकिन लता जी ने वह कमाल बख़ूबी कर दिखाया।

साभार:- श्री रवींद्रनाथ श्रीवास्तव जी।

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