गीत – बदल रही है ज़िन्दगी , बदल रही है ज़िन्दगी .
फ़िल्म – आज़ादी की राह पर (1948)
संगीतकार – जी डी कपूर
गीतकार – साहिर लुधियानवी
गायक – बहादुर सोहराब नानजी

हिन्दुस्तान कला मन्दिर की फ़िल्म ‘आज़ादी की राह पर‘ ( उर्फ़ ‘स्वतंत्रता के पथ पर‘, 1948) वह पहली फ़िल्म मानी जाती है जिसमें आधिकारिक रूप से साहिर लुधियानवी ने गीत लिखे थे। पृथ्वीराज कपूर, वनमाला, जयराज अभिनीत इस फ़िल्म के संगीतकार जी डी कपूर थे। साहिर साहब के लिखे इसमें चार गीत थे – ‘जाग उठा है हिन्दुस्तान’ (कोरस), ‘मेरे चरखे में जीवन का राग सखी’ (कविता), ‘भारत जननी तेरी जय हो, विजय हो’ (बी एस नानजी, गान्धारी) और ‘बदल रही है ज़िन्दगी’ (बहादुर सोहराब नानजी)। साहिर के साथ फ़िल्म में दो गीतकार और थे। प्रसिद्ध स्वतंत्रता सेनानी राम प्रसाद बिस्मिल का गीत ‘दिल फ़िदा करते हैं, क़ुर्बान जिगर करते हैं, पास में कुछ भी है माता की नज़र करते हैं’ तथा श्यामलाल गुप्त (पार्षद) लिखित ‘झण्डा ऊँचा रहे हमारा, विजयी विश्व तिरंगा प्यारा’ जैसे अमर देशप्रेम के गीत इस फ़िल्म की विशेषता थे।

Sahir Ludhianvi- Rare Pics

संगीतकार सरदार मलिक ने ‘सिने प्लॉट’ को दिये एक इंटरव्यू में बताया था कि साहिर लुधियानवी ने फ़िल्मी दुनिया में पहला गाना उनके लिये फ़िल्म ‘खेत‘ में लिखा था। दरअसल वह साहिर की पहले से लिखी एक ग़ज़ल थी – ‘तंग आ चुके हैं कश्मकशे ज़िन्दगी से हम’। उस फ़िल्म में पार्श्वगायन मीना कपूर ने किया था। वह फ़िल्म रिलीज़ ना हो सकी थी और बाद में साहिर ने अपनी वह ग़ज़ल फ़िल्म ‘प्यास‘ ( 1957, गुरुदत्त, माला सिन्हा, वहीदा रहमान) में दे दी थी। ‘प्यासा’ में मोहम्मद रफ़ी ने बिना किसी संगीत के उस ग़ज़ल को तरन्नुम में सुनाया था। एच एम व्ही ने शुरू में उस ग़ज़ल का रिकार्ड नहीं बनाया था। बरसों बाद एल पी में उसे शामिल किया गया। स्वतंत्र गाने के रूप में साहिर की यह ग़ज़ल फ़िल्म ‘लाइट हाउस‘ ( 1958, अशोक कुमार, नूतन) में आयी और उसका रिकार्ड जारी किया गया । एन दत्ता के संगीत निर्देशन में इसे आशा भोंसले ने अपनी आवाज़ दी थी। ‘प्यासा’ की इस ग़ज़ल का मतला (पहला शेर) व एक अन्य शेर का ‘लाइट हाउस’ के गाने में इस्तेमाल हुआ। उनके साथ साहिर ने दो नये शेर जोड़ दिये थे –

गर ज़िन्दगी में मिल गये फिर इत्तफ़ाक़ से
पूछेंगे अपना हाल तेरी बेबसी से हम

ओ आसमान वाले कभी तो निगाह कर
अब तक ये ज़ुल्म सहते रहे ख़ामोशी से हम

साहिर लुधियानवी को सही पहचान और प्रसिद्धि सचिनदेव बर्मन के साथ जुड़ने से मिली – ठण्डी हवायें, लहरा के आयें (1951, नौजवान, नलिनी जयवंत, प्रेमनाथ)। कारदार प्रोडक्शन की इस फ़िल्म के निर्देशक महेश क़ौल थे । नवकेतन की फ़िल्म ‘बाज़ी‘ ( 1951, देव आनन्द, गीताबाली, कल्पना कार्तिक) जिसके निर्देशक गुरुदत्त थे ,ने साहिर लुधियानवी को पूरी तरह स्थापित कर दिया था। ‘बाज़ी’ में मानो सुरीले गीतों की झड़ी सी लग गयी थी – ‘तदबीर से बिगड़ी हुयी तक़दीर बना ले’ (गीतादत्त), ‘सुनो गज़र क्या गाये’ ( गीतादत्त ), ‘देख के अकेली मोहे बरखा सताये’ ( गीतादत्त ), ‘ये कौन आया कि मेरे दिल की दुनिया में बहार आई ( गीतादत्त ), ‘आज की रात पिया दिल ना तोड़ो’ (गीतादत्त) , शर्माये काहे , घबराये काहे’ (शमशाद बेग़म)। साहिर साहब और सचिन दा ने लगभग 16 फ़िल्मों में साथ काम किया जिनमें मुख्य हैं – प्यासा, फ़ण्टूश, देवदास, मुनीमजी, हाउस नम्बर 44, टैक्सी ड्राईवर, जाल, बाज़ी, नौजवान वग़ैरह वग़ैरह।

साभार:- श्री रवींद्रनाथ श्रीवास्तव जी।

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