गीत – मेरी आँखों से कोई नींद लिये जाता है
फ़िल्म – पूजा के फूल (1964)
संगीतकार – मदन मोहन
गीतकार – राजेन्द्र कृष्ण
गायिका – लता मंगेशकर

लता मंगेशकर की मदन मोहन से पहली मुलाक़ात फ़िल्म ‘शहीद‘ (1948) की रिकार्डिंग के अवसर पर हुई थी। संगीतकार ग़ुलाम हैदर के संगीत में दोनों ने एक डुएट रिकार्ड करवाया था -‘पिंजरे में बुलबुल बोले, मेरा छोटा सा दिल डोले’। यह एक भाई बहन का गाना था। उस समय से लता मंगेशकर के लिये वो मदन भैया हो गये और उस रिश्ते को उन्होंने ताउम्र निभाया। वह ‘डुएट’ फ़िल्म में नहीं रखा गया, ना ही उसका रिकार्ड रिलीज़ हुआ। ‘शहीद’ में मदन मोहन ने एक छोटी सी भूमिका निभाई थी। संगीतकार के रूप में मदन मोहन की पहली फ़िल्म ‘आँखें‘ (1950) थी। उन्होंने पहला गीत जो रिकार्ड करवाया वो इस फ़िल्म में मुकेश की आवाज़ में था- ‘प्रीत लगा के मैंने ये फल पाया’। उसमें लता मंगेशकर का कोई गीत नहीं था। लेकिन इसके बाद लता मंगेशकर के गीत मदन मोहन की अधिकांश फ़िल्मों में अपनी मज़बूत उपस्थिति दर्ज़ कराते रहे। ‘एक मुट्ठी आसमान’ ,’परवान’ जैसी कुछ फ़िल्में अपवाद स्वरूप हैं जिनमें लता जी के गीत नहीं हैं।

ए व्ही एम प्रोडक्शन की ‘पूजा के फूल‘ (1964) में धर्मेन्द्र, माला सिन्हा, निम्मी, अशोक कुमार और प्राणप्रमुख भूमिकाओं में थे। निम्मी इसमें एक नेत्रहीन लड़की का रोल निभा रहीं थीं। उनके ऊपर फ़िल्माने के लिये मदन मोहन ने लता मंगेशकर के स्वर में एक गीत रिकार्ड कर लिया था- ‘मुझे अपनी अँखियाँ दे दे ओ प्यारे पंछी’। लेकिन बाद में निर्देशक ए भीमसिंह ने अपना इरादा बदल कर तोते के बजाय बिल्ली के साथ निम्मी पर गीत फ़िल्माने का निर्णय ले लिया। उनके अनुरोध पर मूल तमिल फ़िल्म, जिसका हिन्दी रीमेक ‘पूजा के फूल’ थी, के गीत की धुन पर मदन मोहन को बेमन से गीत बनाना पड़ा -‘म्याऊं म्याऊं मेरी सखी, अच्छी अच्छी मेरी सखी, बोल मेरे बलमा की सूरत है कैसी’।

‘पूजा के फूल’ का गीत ‘मेरी आँखों से कोई नींद लिये जाता है’ मदन मोहन ने लता मंगेशकर की आवाज़ में एक बार रिकार्ड कर लिया था। उस गीत में मुख्यत: पंडित शिव कुमार शर्मा का संतूर और अन्य वाद्य इंटरल्यूड में उपयोग में लाये गये थे। पर फिर मदन मोहन को लगा कि इस गीत में अगर सितार को प्रमुखता दी जाये तो इसका स्वरूप ज़्यादा निखर कर सामने आयेगा। उस्ताद रईस खान मदन मोहन के घनिष्ठ मित्रों में एक थे। उनके सितार वादन के मदन मोहन क़ायल थे। यह गीत फिर रईस खान के सितार के साथ दोबारा रिकार्ड हुआ और फ़िल्म में रखा गया।

सितार मदन मोहन का अत्यन्त प्रिय वाद्य था। उस्ताद रईस खान ने उनके कई गीतों में सितार बजाया था। फिर सत्तर के दशक की शुरुआत में दोनों दोस्त मदन मोहन और रईस खान के बीच कुछ ग़लतफ़हमियाँ पैदा हो गयीं और दोनों ने साथ काम करना बन्द कर दिया। इसका मदन मोहन पर गहरा असर पड़ा। उन्होंने अपने गीतों में सितार का प्रयोग बंद कर दिया। 1973 की ‘दिल की राहें’ , ‘हँसते ज़ख़्म‘ वो आख़री फ़िल्में हैं जिनके गीतों में सितार है। बाद की फ़िल्में जैसे ‘मौसम’, ‘हिन्दुस्तान की कसम’, ‘लैला मजनूं’ आदि के गीतों में मदन मोहन ने सितार का एकदम इस्तेमाल नहीं किया है।

साभार:- श्री रवींद्रनाथ श्रीवास्तव जी।

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