गीत – ज़िन्दगी सहरा भी है और ज़िन्दगी गुलशन भी है
प्यार में खो जाओगे तो ज़िन्दगी मधुबन भी है ।
फ़िल्म – कहीं और चल (1968)
संगीतकार – शंकर जयकिशन
गीतकार – हसरत जयपुरी
गायिका – लता मंगेशकर

निर्देशक विजय आनन्द के कई इंटरव्यूज़ के आधार पर लेखिका अनिता पाध्ये ने मराठी में उनकी प्रमाणित जीवनी लिखी थी -‘एक होता गोल्डी’। उस जीवनी में विजय आनन्द, जिन्हें बचपन से उनके सुनहरे बालों के कारण प्यार से गोल्डी पुकारा जाता था, ने फ़िल्म ‘कहीं और चल‘ से मिले अपने बुरे अनुभव के बारे में बताया था।

कैमरामैन जाल मिस्त्री नवकेतन से जुड़े हुये थे। उन्होंने जब एक फ़िल्म बनाने का विचार किया तो देव आनन्द और विजय आनन्द दोनों भाई उनकी मदद के लिये आगे आ गये। फ़िल्म ‘कहीं और चल’ के लिये देव आनन्द के साथ आशा पारेख को लिया गया और विजय आनन्द ने निर्देशन की बागडोर संभाल ली। संगीत के लिये उस समय की सफलतम जोड़ी शंकर जयकिशन को साइन कर लिया गया। फ़िल्मिस्तान के तोलाराम जालान फ़िल्म को फ़ाइनेंस करने तैयार हो गये । बदले में उन्होंने जाल मिस्त्री से फ़िल्म के सारे अधिकार अपने नाम लिखवा लिये।

विजय आनन्द और देव आनन्द के नाम फ़िल्म के साथ होने से सभी कलाकारों और तकनीशियनों ने भी सहर्ष अपना सहयोग देना स्वीकार किया। पर फ़ाइनेंसर तोलाराम जालान के मन में कुछ और ही चल रहा था। कुछ दिनों बाद उन्होंने सबको पैसा देना बन्द कर दिया। आनन्द बंधुओं के अच्छे सम्बंधों के कारण फिर भी फ़िल्म की शूटिंग काफ़ी हद तक पूरी हो गयी। तब तोलाराम जालान ने बिना विजय आनन्द को बताये फ़िल्म का पैचवर्क डुप्लीकेट्स से पूरा करवा कर, डबिंग आर्टिस्ट्स से डबिंग करा फ़िल्म रिलीज़ कर दी। सीमित प्रदर्शन के बाद जल्द ही उन्होंने सिनेमाघरों से वह फ़िल्म वापस ले ली। दरअसल उनका शुरू से ही इरादा फ़िल्म को सुपर फ्लाप दिखला कर अपना इनकम टैक्स का हिसाब एडजेस्ट करने का था । जिसमें वे सफल रहे। लेकिन आनन्द बंधु और जाल मिस्त्री ठगे गये।

फ़िल्म ‘कहीं और चल’ के लिये शंकर जयकिशन ने छः मधुर गीत रचे थे। कोई प्रचार प्रसार न होने पर भी लता मंगेशकर का गाया यह गीत रेडियो पर अत्यन्त लोकप्रिय हुआ था। हसरत जयपुरी ने बड़े फ़लसफ़ाना अन्दाज़ में लिखा था –

ज़िन्दगी सहरा भी है और ज़िन्दगी गुलशन भी है
प्यार में खो जाओगे तो ज़िन्दगी मधुबन भी है।

साभार:- श्री रवींद्रनाथ श्रीवास्तव जी।

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