तीन-चार साल पहले, जवानी के शुरूआती दौर में ज़ोहरा सहगल की आवाज़ में जब “और भी दुःख हैं ज़माने में मुहब्बत के सिवा” सुना था तो ‘फैज़‘ आज के “डॉक्टर जहाँगीर खान” लगने लगे थे। धीरे-धीरे बढ़ते हुए बड़े हुए तो अब प्यार होना और दिल टूटना और ‘कुर्सी बदलने’ जितना सहज हो गया है। प्यार, ब्लड बैंक में खून देने जैसा हो गया है। मोटी सूईं जब बाज़ू में जाती है तो एक टीस होती है, डर लगता है, थोड़ी देर बाद कोई मशवरा देता है कि दो घंटे तक इससे कुछ भारी काम मत करना तो ख़ुशी शायद तब तक रहती है जब तक सूईं की जगह बैंड-एड का गम(ग़म नहीं) बाक़ी रहता है। 2-3 बार से ज्यादा जब ब्लड डोनेट कर आयें तो वो अहसास भी धीरे-धीरे ख़तम होने लगता है।

The Legend of Romance – Shahrukh Khan (Part 1)

डियर ज़िन्दगी‘ एक ऐसी कहानी है जिसे खुद को ज़िम्मेदार दिखाने के चक्कर में हम कभी कह नहीं पाते। प्यार शायद sophisticated लोगों के बस की बात नहीं है! उनके लिए नहीं है जो प्यार होने का जश्न न मना सकें या दिल टूटने का ग़म न दिखा सकें। ‘देवदास’ होना यहाँ ‘आगरा’ जाने की पहली सीढ़ी है। कितने मासूम होंगे वो लोग जो “मुझे जीने नहीं देती है याद तेरी” या “प्यार झूठा सही दुनिया को दिखाने आजा, तू किसी और से मिलने के बहाने आजा” भरी महफ़िल में गा देते होंगे। प्यार में रोना बेवकूफ़ी है और अगर आंसू सोशल मीडिया पर टपकाए तो आपसे ज़्यादा बड़ा लूज़र कोई नहीं। पैसा, बंगला-गाडी आप दिखा सकते हैं पर अपनी नयी दुल्हन और प्यार को छुपा कर रखना ही समझदारी है।

फ़िल्में ऐसी नहीं होती हैं। फ़िल्में ‘लार्जर देन लाइफ़’ ही हों तो ठीक रहता है। जो कुछ हमारे चारों तरफ हो रहा है उसे पैसे दे के क्यों देखने जाएँ?

“फ़िल्म लाइन में ज़्यादातर लोग gay नहीं accepting होते हैं” ये फ़िल्म नहीं असल में होना चाहिए था। प्यार में असफ़ल होकर या असफ़ल प्यार में दुखी होकर अगर ‘कायरा’ US जाकर अपनी बुलंदियां हासिल कर लेती तो शायद फ़िल्म, ‘फ़िल्म’ होती। उन्होंने फ़क़त चाहा था ये हो जाए, मग़र ये हो न सका।

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“फॉर्मल सेमीनार में फ़टी हुई जीन्स पहन कर आये पागल को सायकायट्रिस्ट की नहीं स्टायलिस्ट की ज़रुरत होती है” कह कर तालियां तो बटोर ली गईं पर भागदौड़ भरी असल ज़िन्दगी में ऐसे डिज़ायनर दोस्तों का होना बहुत ज़रूरी है।

‘जहाँगीर खान’ के “कभी-कभी हम मुश्क़िल रास्ता सिर्फ इसलिए चुनते हैं क्योंकि हमें लगता है कि ज़रूरी चीज़ें पाने के लिए हमें मुश्क़िल रास्ता अपनाना चाहिए और ऐसा करके अपने आप को punish करना ज़रूरी समझते हैं जबकि उस मुश्किल का सामना करने के लिए हम तैयार ही नहीं हैं” समझाने के बाद भी थियेटर में पीछे बैठा हमउम्र फ़िल्म के बाद जब ‘वाशरूम’ में मिला तो कहने लगा “प्यार में पागल हो के डॉक्टर के पास कौन जाता है और डॉक्टर भी तो भाषण दे के पागल ही बनाता है इससे अच्छा तो दस दिन दारू पियो और खुद को काम के नशे में इतना थका दो कि कुछ और चीज़ याद ही न आये।”

ये फिल्म जहाँ बढ़ी, वहीँ हार गयी।

प्यार एक कुर्सी है और कुर्सी कबड्डी खेलने के लिए नहीं होती, उसके लिए समंदर है।

“कुर्सी as in chair!”

Written By: Akshay Sharma

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