गीत – चुनरी संभाल गोरी , उड़ी चली जाये रे
फ़िल्म – बहारों के सपने (1967)
संगीतकार – राहुलदेव बर्मन
गीतकार – मजरूह सुल्तानपुरी
गायक – मन्ना डे, लता मंगेशकर 

‘बहारों के सपने’ निर्माता , निर्देशक नासिर हुसैन की एक ऐसी फ़िल्म थी जो उनकी मसाला फ़िल्मों से बिल्कुल हट कर थी । इस फ़िल्म में जाने माने नासिर हुसैन नज़र नहीं आते । नासिर हुसैन ने अपने कालेज के दिनों में उर्दू पत्रिका ‘ आजकल ‘ की एक कहानी लेखन प्रतियोगिता में प्रथम पुरस्कार प्राप्त किया था । उस प्रतियोगिता में लखनऊ , इलाहाबाद और अलीगढ़ विश्वविद्यालय के विद्यार्थियों ने भाग लिया था । उस पुरस्कृत कहानी पर ही उन्होंने ‘ बहारों के सपने ‘ फ़िल्म बनाने का निश्चय किया था ।

Majrooh Sultanpuri – A Biopic

फ़िल्म ब्लैक एण्ड व्हाइट और छोटे बजट की थी । राजेश खन्ना जो उन दिनों नये नये उभर रहे थे , नायक के रूप में साइन किये गये । ‘ आख़री ख़त ‘ और ‘ राज़ ‘ के बाद यह उनकी तीसरी फ़िल्म थी । वे फ़िल्मफ़ेयर और यूनाइटेड प्रोड्यूसर्स एसोसियेशन के द्वारा आयोजित एक टैलेण्ट हंट में जीत कर सामने आये थे। नासिर हुसैन , शक्ति सामंत , बी आर चोपड़ा , हेमन्त कुमार आदि उस एसोसियेशन के सदस्य थे । सबने राजेश खन्ना को अपनी अपनी फ़िल्मों में काम दिया था। नायिका के रूप में पहले नन्दा को लेने का विचार था । लेकिन कहानी सुन कर उन्होंने यह प्रस्ताव अस्वीकार कर दिया । उन दिनों वे ग्लैमरस भूमिकायें कर अपनी छोटी बहन वाली इमेज से मुक्त होना चाह रहीं थीं।

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नासिर हुसैन एक साथ दो फ़िल्में बनाने की योजना पर आगे बढ़ रहे थे । देव आनन्द को हीरो ले कर वे अपने निर्देशन में ‘ तीसरी मंज़िल ‘ बनाना चाह रहे थे तथा विजय आनन्द के निर्देशन में ‘ बहारों के सपने ‘ बनाने का विचार था । इस पर देव आनन्द ने उन्हें ताना सुना दिया था कि मेरे छोटे भाई को एक छोटी बजट की ब्लैक एण्ड व्हाइट प्रयोगात्मक फ़िल्म दे रहे हो और ‘ तीसरी मंज़िल ‘ जैसी रंगीन और मनोरंजक फ़िल्म ख़ुद डायरेक्ट करना चाह रहे हो । यह बात नासिर हुसैन को चुभ गयी । उन्होंने ‘ बहारों के सपने ‘ ख़ुद डायरेक्ट करने का निर्णय पक्का कर लिया और ‘ तीसरी मंज़िल ‘ की ज़िम्मेदारी विजय आनन्द को सौंप दी । देव आनन्द ने बाद में वह फ़िल्म छोड़ दी थी और उनकी जगह शम्मी कपूर आ गये थे । देव आनन्द ने एक बार कहा था कि मैंने जो जो फ़िल्में छोड़ीं उन्हें शम्मी कपूर ने स्वीकार किया और मेरे लिये चुनौती बन कर उभरे । ‘ तुमसा नहीं देखा ‘ , ‘ जंगली ‘ और ‘ तीसरी मंज़िल ‘ वे फ़िल्में हैं जो देवआनन्द ने ठुकरा दी थीं ।

Intoxicating Dev Anand

‘ बहारों के सपने ‘ पहले एक दुखान्त फ़िल्म थी । राजेश खन्ना व आशा पारेख दोनों की गोलियों से मृत्यु हो जाती थी और उनकी अंतिम यात्रा के दृश्य से फ़िल्म समाप्त होती थी । बैक ग्राउण्ड में गाना बजता था ‘ ज़माने ने मारे जवाँ कैसे कैसे , ज़मीं खा गयी आसमां कैसे कैसे ‘। फ़िल्म जब रिलीज़ हुयी तो टिकिट खिड़की पर एकदम ठण्डी रही । समालोचकों ने भी उसकी धज्जियाँ उड़ाईं । घबरा कर एक सप्ताह बाद फ़िल्म का अंत सुखान्त बना कर पेश किया गया । राजेश खन्ना और आशा पारेख क्षितिज की ओर साथ जाते नज़र आते हैं और पीछे से ‘ ओ मोरे सजना ‘ गीत गूँजता सुनाई देता है । लेकिन कोई लाभ नहीं हुआ । यह फ़िल्म नासिर हुसैन की पहली फ़्लॉप फ़िल्म के रूप में दर्ज हो गयी।

‘बहारों के सपने ‘ का एकमात्र उज्ज्वल पक्ष राहुलदेव बर्मन का मधुर संगीत था । ‘आजा पिया तोहे प्यार दूँ’ , ‘ क्या जानूं सजन होती है क्या ग़म की शाम’, ‘चुनरी संभाल गोरी’ जैसे सदाबहार गीत उन्होंने दिये । ‘ चुनरी संभाल गोरी ‘ उस डिप्रेसिंग फ़िल्म में ताजा़ हवा के झोंके सा सहला जाता था । इस गीत का प्रील्यूड म्यूज़िक ख़ासा लम्बा था । नर्गिस के सौतेले भाई अनवर हुसैन और आशा पारेख पर यह फ़िल्माया गया था । अंत अंत में गीत बेहद तेज़ गति पकड़ लेता था । राजेन्द्र नाथ , मनोरमा आदि कलाकारों के नृत्य में शामिल होने के साथ साथ दर्शक का मन भी सबके साथ थिरकने के लिये आतुर हो उठता था।

साभार:- श्री रवींद्रनाथ श्रीवास्तव जी।

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