गीत – मैं तो कब से खड़ी इस पार
कि अँखियाँ थक गयीं पंथ निहार
आ जा रे परदेसी
फ़िल्म – मधुमती (1958)/ गुड्डी (1971)
संगीतकार – सलिल चौधरी
गीतकार – शैलेंद्र
गायिका – लता मंगेशकर

फ़िल्मों के पीछे पागल गुड्डी, विशेषत: नायक धर्मेन्द्र की दीवानी गुड्डी की तलाश में हृषिकेश मुखर्जी पूना फ़िल्म इन्स्टिट्यूट गये थे । वहाँ उन्हें प्रतिभावान जया भादुड़ी मिल गयीं जो कुछ वर्ष पहले सत्यजीत राय की बांगला फ़िल्म ‘ महानगर ‘ ( 1963 ) में बाल भूमिका निभा चुकी थीं । जया भादुड़ी के साथ उन्हें नायक के रूप में भी एक अपरिचित चेहरा चाहिये था । अमिताभ बच्चन ‘ सात हिन्दुस्तानी ‘ कर चुके थे और हृषिकेश मुखर्जी के साथ ‘ आनन्द ‘ कर रहे थे । उनका चेहरा हिन्दी फ़िल्म दर्शकों के लिये अचीन्हा ही था । ‘ गुड्डी ‘ के लिये उन्हें भी साइन कर लिया गया ।

Dharmendra –Superstar, Lost In Transition

शूटिंग शुरू हो गयी । इस बीच ‘ आनन्द ‘ फ़िल्म रिलीज़ हुयी और खासी हिट हो गयी । ‘ आनन्द ‘ राजेश खन्ना के साथ साथ ‘ बाबू मोशाय ‘ के रूप में अमिताभ बच्चन को भी एक पहचान मिल गयी । इस पहचान के कारण ‘ गुड्डी ‘ उनके हाथ से निकल गयी । उन्हें ‘ गुड्डी’ से हटा कर , हृषिकेश मुखर्जी को वह भूमिका समित भंज को देनी पड़ी ।
‘ गुड्डी ‘ का संगीत वसंत देसाई दे रहे थे और गीतकार गुलज़ार थे । नायिका नई थीं अतएव उनके लिये हृषि दा आवाज़ भी नई चाह रहे थे । वसंत देसाई की खोज के रूप में वाणी जयराम सामने आयीं । फ़िल्म में मात्र तीन गीत थे । दो गुलज़ार के लिखे हुये और तीसरा गीत मीराबाई का एक भजन था । सबसे पहले मीरा भजन रिकार्ड किया गया -‘ हरि बिन कैसे जियूँ रे ‘ ।

Hrishikesh Mukherjee – The Pied Piper of Indian Cinema

कदाचित वाणी जयराम के गाये इस मीरा भजन का प्रभाव गुलज़ार पर ऐसा पड़ा कि जब कुछ वर्षों बाद उन्होंने फ़िल्म ‘ मीरा ‘ का निर्देशन किया तो उसके सारे गीत वाणी जयराम से गवाये । ‘ गुड्डी ‘ के दो अन्य गीत थे -‘ हमको मन की शक्ति देना ‘ और ‘ बोले रे पपीहरा ‘ । ये दोनों गीत बेहद लोकप्रिय हुये। पहली प्रार्थना तो कुछ स्कूलों में सचमुच प्रार्थना के रूप में नियमित गाई जाने लगी ।  इन गीतों के अलावा हृषि दा ने स्वनिर्देशित फ़िल्म ‘ असली नक़ली ‘ ( 1962 , देव आनन्द , साधना ) के एक गीत ‘ तुझे जीवन की डोर से बाँध लिया है ‘ ( लता मंगेशकर , मोहम्मद रफ़ी , हसरत जयपुरी , शंकर जयकिशन ) का भी बड़ा ख़ूबसूरत इस्तेमाल ‘ गुड्डी ‘ में किया । धर्मेन्द्र की दीवानी गुड्डी सपने में उनके साथ यह प्रेमगीत गाती हुई नज़र आती है ।

फ़िल्म ‘ गुड्डी ‘ वाणी जयराम के गाये तीनों गीतों के साथ रिलीज़ की गयी लेकिन एक सप्ताह बाद वाणी का गाया मीरा भजन ‘ हरि बिन कैसे जियूँ रे ‘ हटा दिया गया । उसके बदले पार्टी के दृश्य को रीशूट कर बिमलराय प्रोडक्शन की फ़िल्म ‘ मधुमती ‘ ( 1958, दिलीप कुमार , वैजयंतीमाला ) , जिसकी एडिटिंग हृषिकेश मुखर्जी ने की थी , का एक सदाबहार गीत फ़िल्म में जोड़ दिया गया – मैं तो कब से खड़ी इस पार, कि अँखियाँ थक गयीं पंथ निहार, आजा रे परदेसी।

साभार:- श्री रवींद्रनाथ श्रीवास्तव जी।

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