गीत – पुकारो मुझे नाम ले कर पुकारो
मुझे तुमसे अपनी ख़बर मिल रही है
फ़िल्म – भूल न जाना (अप्रदर्शित)
संगीतकार – दानसिंह
गीतकार – गुलज़ार
गायक – मुकेश

निर्माता जगन शर्मा ने 1962 के भारत-चीन युद्ध पर एक फ़िल्म बनाई थी – ‘भूल न जाना’। जगन शर्मा के बेटे प्रदीप शर्मा (टूटू शर्मा) हैं जिनका विवाह पद्मिनी कोल्हापुरे से हुआ है। प्रदीप शर्मा ने भी ‘भूल न जाना’ में अभिनय किया था। आर्थिक दिक़्क़तों के चलते फ़िल्म पूरी होते होते 1972 आ गया। इतने समय में पूरा परिदृश्य बदल चुका था। भारत-चीन सम्बन्ध सामान्य हो गये थे और विदेश मंत्रालय ने इस फ़िल्म को रिलीज़ करने की अनुमति नहीं दी। डर था कि इससे दोनों देशों के सामान्य होते सम्बंधों पर विपरीत असर पड़ सकता था। फ़िल्म तो रिलीज़ न हो सकी पर इसका म्यूज़िक रिलीज़ हो चुका था।

A photo tribute to Mukesh

संगीतकार दानसिंह के साथ इसमें इन्दीवर, गुलज़ार और हरिराम आचार्य के गीत थे। इंदीवर ने पहले ‘चंदन सा बदन चंचल चितवन, धीरे से तेरा ये मुस्काना’ गीत ‘भूल न जाना’ के लिये लिखा था। दानसिंह ने इसकी धुन भी बना ली थी। बाद में जगन शर्मा से अनुमति ले कर इंदीवर ने यह गीत ‘सरस्वती चन्द्र’ के लिये दे दिया। वह गाना दानसिंह की मूल धुन पर ही रिकार्ड किया गया था।

Rare Photos- Gulzar

हरिराम आचार्य रचित एक गीत गीतादत्त की आवाज़ में था -‘मेरे हमनशीं, मेरे हमनवां, मेरे पास आ, मुझे थाम ले’। गीतादत्त का जीवन उन दिनों बेहद उछलपुथल भरा, मानसिक तनाव वाला था। गीत की रिकार्डिंग के दौरान वे भावुक हो रो पड़ी थीं।

‘भूल न जाना’ का सबसे ख़ूबसूरत गीत गुलज़ार की क़लम से उतरा था, उसे भूल जाना असंभव है। मुकेश के भावपूर्ण गायन ने उसे एक अलग ही धरातल पर पहुँचा दिया है –

पुकारो मुझे नाम ले कर पुकारो
मुझे तुमसे अपनी ख़बर मिल रही है
ख़यालों में तुमने भी देखी तो होंगी
कभी मेरे ख़्वाबों की धुँधली लकीरें
तुम्हारी हथेली से मिलती हैं जा कर
मेरे हाथ की ये अधूरी लकीरें
बड़ी सरचढ़ी हैं ये ज़ुल्फ़ें तुम्हारी
ये ज़ुल्फ़ें मेरे बाज़ुओं में उतारो.

साभार:- श्री रवींद्रनाथ श्रीवास्तव जी।

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