गीत – ये चेहरा, ये ज़ुल्फ़ें जादू सा कर रहे हैं, तौबा तौबा
फ़िल्म – दुनिया का मेला (1974)
संगीतकार – लक्ष्मीकांत प्यारेलाल
गीतकार – आनन्द बख़्शी
गायक – मोहम्मद रफी, लता मंगेशकर

सदी के महानायक अमिताभ बच्चन की फ़िल्मी यात्रा की शुरुआत काफ़ी कठिनाइयों भरी थी। उनकी पहली फ़िल्म ‘सात हिन्दुस्तानी‘ (1969) टिकिट खिड़की पर असफल रही थी। इसके बाद लगातार असफल फ़िल्मों की एक लम्बी क़तार है – बंसी और बिरजू, एक नज़र, रास्ते का पत्थर, संजोग बँधे हाथ, प्यार की कहानी, सौदागर आदि आदि। नायक के रूप में असफल होने पर उन्होंने निगेटिव भूमिकाओं में भी क़िस्मत आज़माई – ‘परवाना‘ (नवीन निश्चळ, योगिता बाली) और ‘गहरी चाल‘ (जीतेन्द्र, हेमा मालिनी)। लेकिन बाक्स आफिस पर ये दोनों फ़िल्में भी लुड़क गयीं। उन्हें पहली सफलता फ़िल्म ‘ज़ंजीर‘(1973) से मिली यह तो सर्वज्ञात है। उससे पहले उन्हें अनलकी या जिन्क्स्ड माना जाने लगा था।

A rare photo album of actor Mehmood.

निर्माता जी एम रोशन और निर्देशक कुन्दन कुमार ने अमिताभ बच्चन और रेखा को ले कर फ़िल्म ‘दुनिया का मेला‘ शुरू की थी। लेकिन अमिताभ की एक के बाद एक फ्लाप होती फ़िल्मों को देख कर वे परेशान हो गये। जी एम रोशन भी फ़िल्मी दुनिया के अधिकांश लोगों की तरह अंधविश्वासी और वहमी थे। उन्हें लगने लगा कि वाक़ई अमिताभ बच्चन अनलकी हैं। वे जिस भी फ़िल्म में काम करते हैं वह बाक्स आफ़िस पर डूब जाती है। ‘दुनिया का मेला’ की कुछ शूटिंग हो चुकी थी। अमिताभ बच्चन और रेखा पर एक गाना भी फ़िल्माया जा चुका था। लेकिन निर्माता जी एम रोशन ने फ़िल्म से अमिताभ बच्चन को निकाल कर संजय खान को साइन कर लिया।

Amitabh Bachchan : The Blender of Perfect Combinations

अमिताभ बच्चन और रेखा पर ‘ये चेहरा, ये ज़ुल्फ़ें जादू सा कर रहे हैं, तौबा तौबा’ गीत फ़िल्माया गया था। बाद में यही गीत दोबारा नये हीरो संजय खान और रेखा पर फ़िल्माया गया। यू ट्यूब पर अमिताभ बच्चन और रेखा पर फ़िल्माया यह गीत उपलब्ध है लेकिन उसमें ग़लती से उसे फ़िल्म ‘एक था चंदर एक थी सुधा’ का बतलाया गया है।

साभार:- श्री रवींद्रनाथ श्रीवास्तव जी।

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