गीत – कहना एक दीवाना तेरी याद में आहें भरता है
लिख कर तेरा नाम ज़मीं पर उसको सजदे करता है
फ़िल्म – लैला मजनू (1976)
संगीतकार – मदन मोहन/जयदेव
गीतकार – साहिर लुधियानवी
गायक – मोहम्मद रफी, लता मंगेशकर


मदन मोहन और जयदेव ऐसे दो प्रतिभासम्पन्न संगीतकार थे जिनकी प्रतिभा के अनुरूप उन्हें फ़िल्मी दुनिया में मान्यता और सफलता नहीं मिली। मदन मोहन लगातार मधुर धुनें बनाते रहे जो लोकप्रिय भी हुईं पर उनकी अधिकांश फ़िल्में टिकिट खिड़की पर हिट नहीं रहीं। उन्हें नामिनेट होने के बाद भी फ़िल्मफ़ेयर अवार्ड नहीं मिला। इस बात का उन्हें दुख रहता था।

उनके पुत्र संजीव कोहली के अनुसार जब उन्होंने रेडियो पर सुना कि उनके पिता मदन मोहन को ‘दस्तक‘ (1970) के लिये राष्ट्रीय पुरस्कार मिला है, उस समय मदन मोहन अपने घर के पास ही अपने संगीत कक्ष में बैठे किसी फ़िल्म के संगीत पर काम कर रहे थे। जब वे काम करते थे तो उनकी सख़्त हिदायत थी कि उन्हें डिस्टर्ब न किया जाये। लेकिन उत्साहित किशोर संजीव ने पिता को फ़ोन कर उनसे कहा कि वे उनके पास आ कर एक बड़ी ज़रूरी बात उन्हें बताना चाह रहे हैं। तब बेमन से मदन मोहन ने उन्हें बुलाया। मिल कर संजीव ने जब उन्हें ‘दस्तक’ के लिये राष्ट्रीय पुरस्कार मिलने की ख़बर दी तो उन्हें विश्वास नहीं हुआ।

 
उसी समय जयदेव भी वहाँ पहुँचे और उन्होंने ख़बर की पुष्टि की तब जा कर उन्हें यक़ीन आया। लेकिन वे फ़िल्मी दुनिया से मिलने वाली उपेक्षा से इस क़दर निराश थे कि वे पुरस्कार समारोह में शामिल होने दिल्ली जाने तैयार नहीं थे। ‘दस्तक’ के लिये संजीव कुमार को ‘भरत’ पुरस्कार और रेहाना सुल्तान को ‘उर्वशी’ पुरस्कार भी मिले थे। उन दिनों सर्वश्रेष्ठ अभिनेता के राष्ट्रीय पुरस्कार का नाम ‘भरत’ और सर्वश्रेष्ठ अभिनेत्री के राष्ट्रीय पुरस्कार का नाम ‘उर्वशी’ हुआ करता था। संजीव कुमार के समझाने पर मदन मोहन किसी तरह दिल्ली जाने के लिये तैयार हुये। संजीव कुमार ने उन दोनों के लिये नये सूट सिलवाये जिन्हें पहन कर दोनों पुरस्कार समारोह में सम्मिलित हुये। ‘लैला मजनू’ (1976, ऋषि कपूर, रंजीता) के संगीत पर मदन मोहन काम कर रहे थे।
जुलाई ,1975 में जब उनका देहान्त हुआ तब तक वे फ़िल्म के छः गीत रिकार्ड कर चुके थे। उनका अधूरा काम पूरा करने के लिये निर्देशक एच एस रवेल ने उनके मित्र जयदेव से अनुरोध किया। फ़िल्म के गीतकार साहिर लुधियानवी थे। ‘हम दोनों’ और ‘मुझे जीने दो’ के बाद साहिर लुधियानवी और जयदेव के सम्बन्धों में तनाव आ गया था। लेकिन मदन मोहन की मित्रता का ख़याल कर जयदेव ने उस फ़िल्म का अधूरा काम पूरा करना स्वीकार किया।
उन्होंने फ़िल्म के लिये तीन गीत बनाये – ये दीवाने की ज़िद है, लैला मजनू दो बदन एक जान थे और कहना एक दीवाना तेरी याद में आहें भरता है। इसमें से तीसरे गीत पर मदन मोहन आंशिक तौर पर काम कर गये थे। उस अधूरी धुन को पूर्णता प्रदान कर, तराश कर जयदेव ने अंतिम रूप दिया व रिकार्ड कराया। इस तरह दो अभिन्न मित्रों के सामूहिक योगदान से इस मधुर गीत की रचना हुई।
साभार:- श्री रवींद्रनाथ श्रीवास्तव जी।

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